वैश्य समाज स्वावलंबी और स्वतंत्रा जीवी स्वभाव का समाज है। थोड़ी-सी पूंजी में अपना जीवन यापन करने की कला में माहिर है, वह समाज का परम हितैषी है और मध्ुमक्खी की तरह समाज से ही अपने जीवन जीने का साध्न जुटाता है, अपनी सम्मान की रक्षा करता है और दूसरों को सहयोग करने, उसके आत्मसम्मान, सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा में भरपूर सहयोग करता है। सामाजिक गतिविध् िके पहिया का ध्ूरी है। साथ ही बिना वेतन के कर संग्रह कर सरकार के खजाने को भरने में प्रमुखता से भूमिका निभाता है। जीएसटी, ग्राहकों से वसुला जाता है, यह वसुली दूकानदार करता है।
2025-26 में सरकार को जीएसटी से 22.27 लाख करोड़ का आमद हुआ है। वापसी करने के बाद शु( आय
19.34 लाख करोड़ है। जो भारत सरकार के कुल आय का 18-20» है। भारत सरकार के कुल आय का 5वां हिस्सा जीएसटी से आता है। जो व्यापारियों के मदद से मिलती है।
समाज के कितनी सेवा हम करते हैं, सदूर के गांवों में जहां सड़क नहीं है, गलियां नहीं है, पगडंडी आवागमन का
साध्न है। दैनिक जीवन में आनेवाले अनेकानेक प्रमुख वस्तुओं को उपलब्ध् कराते हैं, सुई हो या छोटा-मोटा मेडिसीन, खाद्य सामग्री आदि। वैश्य समाज को मौसम की परख होती है, समाज को सहेजना जानता है, उसी तरह रिश्ते को सहेजता है।
इसे जीवन जीने के लिए कानून-व्यवस्था चाहिए ताकि निःसंकोच कहीं भी आ जा सके।
मोटे तौर पर इसका मानना है कि -
कोई नृप हो हमहि का हानी
चेरि छाडि़ अब होन की रानी।
तुलसीदास रचित रामचरित मानस के अयोध्या कांड से कैकेयी-मंथरा संवाद से यह ली गयी है। मंथरा का कहना है राजा कोई होऋ उसे क्या हानि, वह दासी छोड़कर रानी नहीं बन सकती है, वह तो सदैव दासी रहेगी।
वैश्य समाज कभी इसी मानसिकता में जीता था। इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अध्किार से कोई सरोकार नहीं थी, कत्र्तव्य तो बखूबी निभाता ही है।
पटना उच्च न्यायालय ने 5 अगस्त 1997 ई. को कहा, यहां जंगल राज है। और पुनः 2002 ई. में मुख्य न्यायाध्ीश आर.एस.ध्वन और जस्टिस आर.एन. प्रसाद की पीठ ने भी सरकार से पूछा था, ‘‘क्या राज्य में जंगल राज है?’’
इस कालखंड में वैश्य समाज असुरक्षित हो गया, रंगदारी टैक्स देने को मजबूर हुए, उसे या उसके परिजन का अपहरण कर ध्न वसूला गया, उसके अचल सम्पत्ति से बेदखल किया गया। सड़क खड्डों में बदल गयी, बिजली का आना समाचार बनता था। सूर्य की उपस्थितिमें भयभीत वातावरण में लोग जीते थे और हर रात्रि काल रात्रि के समान हो गयी थी।
ऐसी विषम परिस्थति में समाज को जागरूक करके, संगठित करके, लोकतांत्रिक अध्किारों के प्रति सचेष्ट करने और बदहाल स्थिति से बाहर निकलने के लिए एक नाम चाहिए था, लोगों के जेहन में यह नमा दानवीर भामाशाह का सामने आया।
जमालपुर ;मंुगेरद्ध के विजय साह का कहना है कि उन्होंने जमालपुर में पहली बार दानवीर भामाशाह की जयंती मनायी। मंुगेर में उसके बाद रणजीत गप्ता ने भामाशाह की जयंती मनायी। 2003 में प्रमंडलीय वैश्य महापंचायत, मंुगेर ने भामाशाह की जयंती मनायी। कालांतर में जिला तैलिक साहू सभा मंुगेर ने कुछ वर्ष मनायी। प्रदेश तैलिक साहू समाज और बिहार वैश्य महासम्मेलन ने लगातार यह प्रयास करती रही कि दानवीर भामाशाह की प्रतिमा पटना में स्थापित हो और उनके जन्म दिवस को राजकीय समारोह के साथ मनाया जाए।
2005 ई. में बिहार में एनडीए की सरकार बनी। सुशील मोदी बिहार के उपमुख्यमंत्राी बने। वैश्य समाज के विभिन्न सामाजिक संगइनों और स्व. सुशील मोदी के प्रयास से सितम्बर 2019 ई. में पुनाईचक में मुख्यमंत्राी नीतीश कुमार ने दानवीर भामशाह के प्रतिमा का अनावरण किया। पटना नगर निगम ने पुनाईचक के इस पार्क को भामाशाह पार्क नाम रखने की घोषणा की। 2023 ई. से भामाशाह का जन्मदिन राजकीय समारोह के साथ मनायी जाने लगी।
दानवीर भामाशाह ने मात्रा 56 वर्ष की आयु तक इस
ध्राधम पर रहे। राणा प्रताप अकबर के साथ यु( में पराजित होकर घास की रोटी खाने को मजबूर हुए थे। उसी समय दानवीर भामशाह ने 25 लाख नगद और 20 लाख अशपर्फी दी थी, जिससे 25 हजार सैनिक का पालन-पोषण सैन्य तैयारी 12 वर्षों तक चली और राणा प्रताप ने अकबर से यु( कर अनेक किले वापस जीते थे। आज का तारीख में यह रकम 30 हजार करोड़ से डेढ़ लाख करोड़ तक में आंकी जाती है।
इस जन्म दिवस मानने का उद्देश्य यह है कि आप भी पहले भामाशाह बने पिफर दानवीर भामाशाह। भामाशाह बनने के लिए केन्द्र और राज्य सरकार के औद्योगिक नीति को समझे और भारतीय बाजार की आवश्यकता के साथ ही विश्व बाजार की जरूरत समझें। बड़े उद्योग स्थापित करने के लिए बड़ी पूंजी की जरूरत है, बड़े-बड़े व्यापारीगण एक समूह बनाए। आपके परिवार में अर्थशास्त्रा, काॅमर्स और बिजनेश मैनेजमेट के डिग्रीधरी कै, उनके साथ बैठकर विचार-विमर्श करके उद्योग जगत में स्थापित हो। ऐसा करना ही दानवीर भामाशाह के आदर्श पर पहला कदम बढ़ाना होगा। साल में एक बार मिलते हैं दानवीर भामाशाह का यशोगान करते हैं, लेकिन उससे सबक नहीं सीखते हैं, तो इस मिलने का औचित्य क्या रह जाता है?
जब तक आप भामाशाह नहीं बनते तब तक आप दानवीर भी नहीं हो सकते हैं। महापुरूषों की आत्मा को शांति तब मिलती है, जब उसके वंशज उससे प्रेरित होकर उसके कामों से बड़ा काम कर बड़ा लकीर खींचते हैं, तब उनके कुल का गौरव बढ़ता है।
आज भी वैश्य समाज की आबादी -----» है। आज भी 6000 रूपये मासिक पारिवारिक आय वाला है। 10, 000 रूपये मासिक पारिवारिक आय वाले --» हैं। इसी तरह --- » असाक्षर है। --» आबादी 5वीं तक पढ़ी है।
इन अशिक्षित और गरीब के लिए कौन सोचेगा? इनके जीवन स्तर को मुख्य धरा में कैसे शामिल किया जा सकता है? यह विचारणीय पहलू है। यदि हम इन सभी के लिए कुछ करके उनके जीवन स्तर को कुछ प्रगति पर लाने में सपफल होते हैं तो दानवीर भामाशाह के प्रति सच्ची श्र(ांजलि होगी।
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