बिहार में बीते अप्रैल माह में एक बड़ा राजनीतिक परिवर्तन हुआ मुख्यमंत्राी नीतीश कुमार ने अपने ही हाथों से बिहार के नीतीश युग के समापन पर हस्ताक्षर कर दिया। अपने ऐतिहासिक कार्यकाल में बिहार के सर्वाध्कि दिनों तक मुख्यमंत्राी पद पर बने रहने वाले ये पहले मुख्यमंत्राी के रूप मेें नाम दर्ज करा लिया है। इन्हें विरासत में जंगल राज से कुख्यात बिहार मिला था और बिहार के बाहर ‘बिहारी’ शब्द उपेक्षा और गाली का पर्याय बन चुका था। नीतीश कुमार के कुशल नेतृत्व में बिहार ने अनेकानेक क्षेत्रों में छलांग लगायी, देश के लिए उदाहरण बना है। नीतीश कुमार का इस तरह से बिहार को अलविदा करना, बिहार की जनता के साथ-साथ विपक्षियों को भी बुरा लगा गया। चूँकि पफैसला नीतीश कुमार के स्वयं का था। इसमें कोई क्या कर सकता? बिहार में भाजपा के नेतृत्व में सम्राट चैध्री मुख्यमंत्राी बने, इसमें नीतीश कुमार की मन-मर्जी चली। नीतीश कुमार को सत्ता में लाने में लव-कुश की बड़ी भूमिका रही थी। अपनी विदाई के समय इन्होंने लव-कुश का कर्जा उतार दिया। कोइरी, कुर्मी, धनुक मिलाकर लगभग 7» आबादी है, उसके मुख्यमंत्राी थे और बने हैं। नेतृत्व करने के लिए जातिय समीकरण के साथ व्यक्तिगत योग्यता भी होती है, उसे स्वीकारना होगा, साथ ही उसके अनुसार खुद को तैयार करना होगा। अपने व्यक्तित्व को विराटृ और प्रबंध्न का विशेषज्ञ बनाना होगा। केवल निंदा और आलोचना से नेतृत्व की क्षमता विकसित नहीं होती है। अब आयी बिहार मंत्रिमंडल में वैश्यों का प्रतिनिध्त्वि की चर्चा। यह सर्वविदित है कि वैश्य समाज भाजपा का कोर वोटर है और भाजपा जिसके साथ गठबंध्न करती है, वैश्य वोट उध्र शिफ्रट कर जाता है, मुड़ जाता है। इसमंे किन्तु-परंतु नहीं है। विगत लोकसभा चुनाव में भाजपा ने वैश्यों के उम्मीदवारी में कमी की थी, उसका जवाब बिहार के वैश्यों ने बड़ी शालीनता के साथ मतों के द्वारा भाजपा को दे दिया, बिहार से वैश्य के उतने ही सांसद रहे जितने पूर्व में थे लेकिन वैश्य ने एनडीए को 39 से 30 में समेट दिया। जिसका मूल्यांकन भाजपा नेतृत्व ने किया, विधनसभा में एनडीए ने ठीक-ठाक उम्मीदवार बनाया और लगभग 90» सपफल भी रहा। वैश्य बिना शोर-गुल के ईंट का जवाब पत्थर से देती है। समझना है तो समझो, ना समझना है तो, ना समझो, हमारे पास समझाने का समय नहीं है। समय के साथ संतुलन बना लेते हैं। बिहार में 36 मंत्रिपरिषद के सदस्य होंगे, इसमें 6 वैश्य को मंत्रिमंडल में होना चाहिए। 3 भाजपा से और 3 जदयू से। भाजपा से 3 के बदले दो दिया जाता है लेकिन जदयू एक भी वैश्य को मंत्राी नहीं बनाती है, अपवाद में स्व. हरि साह थे। उसके बाद वैश्य से एक भी मंत्राी नहीं बने। जदयू से छः विधयक हैं और विधन परिषद में भी एक सदस्य हैं। जदयू की ओर से भी मंत्रिमंडल में वैश्य को शामिल कराया जाना चाहिए। जैसा आप सिखाएंगे, वो सीखंेगें और जो सीखेंगे वैसा ही जवाब देंगे। वैश्य समाज मूलतः व्यापारी का समाज है, इसे व्यापार से पफुर्सत कहां मिलती जो ये झंडा उठाए? हर हाथ में स्र्माटपफोन है, बंगला देश में हिंदुओं की हत्या और उस पर किया गया अत्याचार, तृणमुल सासंद सायनी घोष का मंच पर गाना दिल में है काबा तो आंखों में मदीना, पश्चिम बंगाल के भ्रद मानुष को बता दिया हिन्दुत्व का अर्थ।
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