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सम्पादकीय : बीज बोने मात्रा से ही फल मिलेगा?

बिहार में वैश्य की आबादी 17.81» है। बिहार विधनसभा में आबादी के समानुपात में हमारी 42-43 सीट होनी चाहिए लेकिन अभी मात्रा 29 सीट हैऋ 13-14 सीट पीछे हैं। विगत विधनसभा में विभिन्न राजनीतिक दलों ने 97 सीट दिया, जिसमें मात्रा 29 सीट पर सपफल हुए हैंे। वैश्य से 121 विधनसभा क्षेत्रा में कुल 184 प्रत्याशी बने। प्रत्याशी को प्राप्त मत उनका शक्ति सामथ्र्य का प्रदर्शन कर दिया। इनमें बहुत सारे जिला परिषद, पंचायत समिति सदस्य, मुखिया और सरपंच हो सकते हैं, उन्हें पूरे-जारे शोर से इन पदों पर उम्मीदवारी देनी चाहिए। जनप्रतिनिध् िका कोई पद छोटा नहीं होता है। जनप्रतिनिध् िअपने अध्किार क्षेत्रा में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है। सीमित क्षेत्रा में अपने वैचारिक क्षमता और कार्य शक्ति का परिचय देकर जनता के मन में भरोसा पैदाकर आगे के विकास केलिए और अपनी महत्वाकांक्षा-पूर्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है, उदाहरण बन सकता है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने वार्ड पार्षद पद से जनप्रतिनिध् िक्षेत्रा में कदम रखा और छठी बार लगातार दरभंगा विधनसभा से निर्वाचित हुए हैं, मंत्राी भी बने। कुमार प्रणय भाजपा में बूथ अध्यक्ष से अपना योगदान देना शुरू किया, आज मुंगेर विधनसभा क्षेत्रा के विधयक हैं। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है। विधनसभा चुनाव हारे हैं। लड़ने वाला जीतता या हारता है। जो लड़ा ही नहीं वह कैसे हारेगा? इस साल पंचायती राज चुनाव होना है। अक्टूबर से दिसम्बर के बीच यह चुनाव सम्पन्न होना है। अतएव अपने क्षेत्रा का गहन अध्ययन करें, उसकी आवश्यकताओं को रेखांकित करें, उसके समाधन में सरकार की कौन-सी योजनाएं कारगर होगी। उस पर चिंतन-मंथन करें और विकास का रूट चाट तैयार करे जो चुनाव के दौरान जनता के समक्ष प्र्रस्तुत किया जा सके। पंचायती चुनाव सामाजिक समीकरण साध्ने का अच्छा विकल्प है, इसमें जिलापरिषद््, पंचायत समिति सदस्य, मुखिया, सरपंच, वार्ड सदस्य, पंच, उपसरपंच, उपमुखिया जैसे अनेक पद हैं। संख्या बल के आधर पर इसे समायोजित किया जा सकता है। प्रबंध्न की प्रतिभा इन्हीं सामाजिक समीकरण में झलकेगी। 
जिस विधनसभा में वैश्य विधयक हुए हैं या निकटतम प्रतिद्वन्दी बने हैं, उन्हें अपने विधनसभा के पंचायती राज चुनाव में अध्किाध्कि वैश्य जनप्रतिनिध् िनिर्वाचित हो, इसके लिए रणनीति बनानी चाहिए। जो पंचायती राज चुनाव में भागीदारी लेना चाहते हैं, उन्हें लाभ मिलने की संभावना कापफी अध्कि होगी। जो पुनः अगली बार विधन सभा चुनाव लड़ने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हैं, उन्हें क्षेत्रा का अध्ययन मनन, चिंतन करने समझने और सहयोगियों की तलाश, भरोसे और काम लायक आदमी की खोज के लिए पर्याप्त समय है। याद रखें जब तक छोटा नेता नहीं बनाएंगे, आप बड़े नेता नहीं बन सकते हैं दूसरे शब्दों में जब तक आप कार्यकत्र्ता नहीं बनाएंगे तब तक नेता नहीं बन सकते हैं।वैश्य संगठनों के नेता केवल विधयक बनने तक का सपना देखते हैं, विधन पार्षद बनने के जुगाड़ में रहते हैं। अपवाद में संसदीय चुनाव लड़ने का सपना देखने वाले या दावेदार हैं। विधनसभा चुनाव समाप्त, उनकी गतिविध् िसमाप्त। इस तरह राजनीतिक जागरूकता आने में अत्याध्कि समय लगेगा। जमीन पर उतरकर काम करना होगा, संगठन के जो मुखिया हैं अथवा उसने समकक्ष माला पहनने वाले, सूमों-बेलोरो पर घुमने वालों को गांवो का ध्ूल पफांकना होगा, आम वैश्यों के बीच जाकर बूथ या वार्ड स्तर से कमिटी का गठन करना होगा। तब अगले विधनसभा तक लक्ष्य पर पहुंचा जा सकता है। बीज बोने मात्रा से ही पफल की प्राप्ति नहीं होगी, उसे सुरक्षित करना होगा। सींचना होगा तभी पफल की प्राप्ति हो सकेगी।

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