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सावधन! आत्मछल

सम्पादक जी महाराज,
    जय हो!
     आपको अपना दोस्त का पता है, दुश्मन का पता होता भी है, और नहीं भी होता है। कुछ दोस्त आस्तीन के सांप होते हैं, जो परिणाम आने के बाद पता चलता है। खैर, यह सब तो बाहरी है, आपके अंदर भी एक शत्राु छिपा है, और इसे पहचानना बहुत-बहुत कठिन है। जिसने इस शत्राु को पहचान लिया, उसे बाहरी शत्राु बहुत बिगाड़ नहीं पाते हैं, पफलतः वे सपफलता के सीढि़यों चढ़ता उसके शीर्ष पर पहुंच जाते और इतिहास गढ़ देते हैं।
यह शत्राु है ‘‘आत्मछल’’ जब आत्मा ही छल करने लगे, तो सपफलता कोसों दूर हो जाती है। संघर्ष जटिल से जटिलतम हो जाता है। पहला सवाल है आत्मा को समझने का। जो आत्मा को नहीं समझता, वो आत्म छल को क्या समझेंगे? आत्मा आप से संवाद करना चाहती है और यह संवाद एकांत में होता है अर्थात् जहां एक भी नहीं है, आपका मस्तिष्क विचारों से शून्य हो। आपका मस्तिष्क विचारों से शून्य हो नहीं पाता है। एक विचार खत्म, दूसरा चालू और यह सिलसिला जागने से लेकर सोने तक होता है। कुछ काम या विचार इतनी शक्तिशाली हो जाती है कि सोने पर स्वप्न के रूप में सामने आ जाती है, कर्म अच्छा तो स्वप्न अच्छा और अच्छा स्वप्न भी खुशी देती है, उफर्जा देती है और आत्मबल को समृ( करता है। लेकिन आपके कर्म, मानव के हित में ना हो, अनैतिक हो, तो परिणाम विपरीत आता है। आप स्वप्न में परेशान हो जाते हैं, जो विभिन्न प्रकार की बिमारियों को जन्म देता है और उससे ग्रसित हो जाते हैं।
आप अपने आप से बात करने के लिए समय निकाले अर्थात् अपने ही मन को सुनने का प्रयास करें। जब सुनने का प्रयास करेंगे तो मन अर्थात् आत्मा आपसे कहने लगती है, यही कहा-पफुसी संवाद है। यह संवाद उन्हीं का सार्थक होता है, जो नैतिकता से जुड़े है या       बंध्ेे हैं। जो व्यक्ति अनैतिकता, अवैधनिकता और असामाजिकता की अंतर भेद नहीं पाता है। उसकी आत्मा उससे छल करने लगती है। उसके दुष्कर्म को सही सि( करने का उदाहरण प्रस्तूत कर देती है। शिक्षित शराबी गालिब, के. एल. सहगल, मीना कुमारी और चर्चिल जैसे लोगों का उदाहरण देकर साबित करते हैं कि शराब पीना गलत नहीं हैं। जब आत्मा उसे शराब पीने से रोकती है, वह स्वंय को न्याय के कठघरे में खड़ा होकर अपने को न्यायोचित सिद्ध् करने के लिए इन उदाहरणों को अपने मन में लाते हैं। यह उदाहरण ही आत्म छल है।
जब आपका, आत्मा ही छल करता हो, वहां आप सपफलता की सीढ़ी कैसे चढ़ेगें? बहुत सारो ईष्यालु और अहंकारी ऐसे ही अनेक तर्क को गढ़ कर स्वयं को न्यायोचित साबित कर देते हैं, इससे दूसरों का कछ नहीं बिगड़ता है, इससे तो उनकी ही व्यापक क्षति होती है जो एक काल खंड गुजरने के बाद अनुभूति में आती है तब तक वो बहुत कुछ गंवा चुके होते हैं। विशेषकर अपना स्वास्थ्य, सामाजिक प्रतिष्ठा आदि। यदि उनके अस्वस्थ होने का सही कारण की तलाश हो तो वह कारण ईष्र्या और अहंकार ही निकलेगा। जो डाॅक्टर के इलाज, दवा से संभव नहीं है। उसका इलाज तो स्वयं ही करना है। अर्थात् आत्मछल से मुक्त होना है।
बहुत सारे बाबाओं के पास ऐसे है आत्मछली का जमावड़ा लगता है। अनेक बाबा स्वंय ही आत्मछल के शिकार हैं। आत्मा आपको सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करने का प्रयास करती है। आप उसे समझने का प्रयास करें, ना कि झूठलाने का। उसे झूठलाना ही आत्मछल है। आत्मछल से बचेंगे तो आप अपने सद् लक्ष्यों को प्राप्त करेंगे। बड़े से बड़े पापी और अपराध्ी को मृत्यु के समय आत्म छल का पता चलता है जब सब समाप्त होता है तो आत्मा की सही बात उनके सामने आती है। जीवन आपका मर्जी आपकी।

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