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पात्राता के कमी के कारण एम्स दिल्ली में पद खाली

देश की आजादी के 79 वर्ष बीत चुके हैं। भारत में गणतंत्रा लागू हुए 74 वर्ष हो चुके हैं। संविधन की अनुच्छेद 333, 338 ;अद्ध, और 338 ;बीद्ध के तहत अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जाति का आयोग बना है। इन सभी आयोग में राष्ट्रीय स्तरीय आयोग में उपाध्यक्ष का पद खाली है। संभव हो कि पात्राता के कमी के कारण पद खाली हो? 
दिल्ली एम्स में पफैक्लटी ;संकायद्ध के 1111 पद हैं जिसके 275 सहायक प्रोपफेसर और 92 प्रोपफेसर के पद रिक्त हैं। रिक्त सारे पद अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी कोटो के हैं। इन पदों के खाली होने का कारण पात्राता की कमी बतायी गयी है।
केन्द्र और राज्य सरकार अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी को पढ़ाई के क्षेत्रा में अध्किाध्कि मदद करने में प्रयास में लगी है और निरंतर इनकी सुविधओं में वृ(ि की जा रही है। नीतीश कुमार की सरकार सात निश्चय-1, 2 और 3 के तहत भरपुर प्रयास कर रही है। बिहार में डिग्री काॅलेज से वंचित 213 प्रखंडों में डिग्री काॅलेज खोलने की तैयारी में है, जमीन खोजी जा रही है। सरकार का दृढ़ संकल्प के प्रकटीकरण का स्वरूप सामने हैं। सरकार जुलाई से पढ़ाई शुरू करने को आतुर है और स्थानीय हाई स्कूलों में समय प्रबंध्न कर डिग्री की पढ़ाई शुरू की जाएगी। बड़ी संख्या में एसोसिएट प्रोपफेसर व प्रोपफेसर की बहाली होगी, कैसे बहाली की जाए इसके प्रति सरकार संवेदनशील है।
सरकार ने अनुसूचित जाति, जनजाति व ओबीसी के सामने थाली पड़ोस कर रख दी है। इन जातियों को इससे 
अध्किाध्कि लाभ लेनी चाहिए।
दुर्भाग्य है कि थाली सामने है लेकिन आंख बंद है। इस आंख खेनले का दायित्व जन प्रतिनिध्यिों और राजनीतिक, सामाजिक जातिय कार्यकत्र्ताओं और नेताओं का है। अनुसूचित जाति के 84 सांसद, जनजाति 47 सांसद हैं अनुसूचित जाति से 614 विधयक व जनजाति से 551 विधयक हैं।
प्रायः राजनैतिक कार्यकत्र्ताओं व नेताओं की महत्वाकांक्षा जनप्रतिनिध् िबनने की होती है उसी में अपनी सारी उर्जा झोंक देते हैं, लक्ष्य प्राप्ति के बाद आगे की महत्वाकांक्षा प्रबल हो जाती है जो केवल और केवल व्यक्तिगत उपलब्ध् ितक में सिमट जाती है। जातिय, सामाजिक और सर्वजनिक हित संबंध्ी बस बातों-बातों में रह जाती है। लगभग सभी राजनैतिक दलों में अनुसूचित जाति, जन जाति और पिछड़ा वर्ग का प्रकोष्ठ बना है। प्रदेश से प्रखंड स्तर की समिति बनी है। लेकिन यह लक्ष्य विहीन है। और संगठन कागजों तक में सिमटी है। केवल चुनाव के समय इन्हें जगाया जाता है, दौड़ाया जाता है और इसमें केवल भाजपा आगे है, उसके पीछे अपवाद में कोई हो और बाकी दलों यू ही हैं। प्रदेश पदाध्किारी की योग्यता केवल जाति है, शैक्षण्कि योग्यता का महत्व नहीं है। अर्थात् जो सही-सही पढ़-लिख नहीं सकते हैं। प्रदेश के नेता हैं। प्रदेश समिति में हैं। 
ग्रेड बी व सी की नौकरी में अनुसूचित जाति व ओबीसी जाति सहजता से नौकरी ले रही है लेकिन यह लाभ या सुविध कुछ गिनी चुनी जातियों में ही सिमटी है। इसमें जागरूक जाति आगे बढ़ रही है। अनुपातिक रूप से अनुसूचित जाति के अन्तर्गत आने वाली अन्यान्य जाति की स्थिति अच्छी नहीं है। यही हाल ओबीसी का है।
अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग के आयोग के पदाध्किारियों व सदस्यों को इन सब बातों से कोई मतलब नहीं है। किसी की हत्या हो गयी, किसी के साथ बलात्कार हो गया वहां यह स्वतः संज्ञाान लेती है। और विकास के प्रति कदापि गंभीर नहीं होती है। 
नियम बनाकर पीठ-थपथपा लिया, नियम कार्यान्वित कैसे हेगी, लक्ष्य की प्राप्ति कैसे हेगी? इसपर कोई चिंतन नहीं कोई काम नहीं।
इन सरकारी आयोग के पदाध्किारियों और सदस्यों को सम्मानजनक वेतन आर सुविध मिलती है। राजनीतिक दलों के प्रकोष्ठों के पदाध्किारी को अपने पाॅकेट से होम करना है।
ए-वन सार्विस लेने के लिए पहले-सपना होना चाहिए। सरकार से संसाध्न की व्यवस्था की है। यहां इन लोगों के पास सपना ही नहीं हैं और ना सपना दिखाने वाले हैं। 
एम्स जैसे संस्थान में पात्राता के कमी के कारण एसोसिएट प्रोपफेसर व प्रोपफसेर नहीं हो, पूरे प्रशासनलिक व्यवस्था राजनीतिक दल और इन जातियों के नेताओं के गाल पर तमाचा है। तमाचा समझे तब न!

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