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बिहार की राजनीति और वैश्य मुख्यमंत्री

एक प्रसिद्ध कहावत है "भोज घड़ी कोहरा रोपे" वैश्य विधायकों की संख्या 29 है. एनडीए से 26 है. बिहार में अनुसूचित जाति के बाद वैश्य की सर्वाधिक आबादी 17.82% है.


बिहार में पुराने कहे जानेवाले वैश्य नेता जो एकाधिक बार से सांसद या विधायक हैं, उनके समर्थकों द्वारा भाजपा के मुख्यमंत्री पद है लिए उनका नाम उछाला जा रहा है. सवाल है कि ये पुराने नेता वैश्य हित के लिए कितना काम किया है? चुनाव के दौरान ही पार्टी के पक्ष में वैश्य को रिझाने विभिन्न क्षेत्रों का तूफानी दौरा किया है. चुनाव खत्म होने के बाद क्या धन्यवाद देने के लिए वैश्य क्षेत्र में गये? ये लोग दोबारा मुड़कर भी उन क्षेत्र का मुँह नहीं देखा,ना कभी वहाँ की सुधि ली. विपक्ष में जब रहे तो वैश्यों पर अत्याचार दिखता रहा. सत्ता में आते ही वैश्य पर अत्याचार दिखना बंद हो गया. ये सूरदास की भूमिका में आ गये. विपक्ष और चुनाव में इन्हें याद रहता है कि ये वैश्य हैं.


केन्द्र की ओबीसी सूची में 8 वैश्य जाति का नाम दर्ज नहीं है. ईडब्ल्यूएस का भी प्रमाण-पत्र निर्गत नहीं होता है. इन जातियों को केन्द्रीय सेवा में किसी प्रकार का लाभ नहीं मिलता है. ये 8 जाति है - ब्याहुत वैश्य, वैश्य पोद्दार, बंदी वैश्य, बरनवाल वैश्य, कमलापुरी वैश्य, कसोधन वैश्य, गंधबनिक वैश्य, बाथम वैश्य और पूर्वी व पश्चिमी चम्पारण का गोलदार वैश्य.


दुर्भाग्य है कि इन 8 जातियों से न एक विधायक है, न एक विधान पार्षद. ये वैश्य की जाति बेचारी बनी है. भाजपा की कोर वोटर है.


2-3 वर्ष पूर्व बिहार विधानसभा में गैर वैश्य व गैर भाजपा, माले विधायक ने वैश्य पोद्दार को केन्द्र की ओबीसी में शामिल करने के लिए माँग की. सरकार ने सकरात्मकता उत्तर दिया लेकिन काम ठंढ़े बस्ते में डाल दिया. पिछले विधान सभा के अंतिम सत्र में मोरबा का राजद वैश्य विधायक ने पुन: ये सवाल उठाया परिणाम ढ़ाक का तीन पात है. एनडीए के 26 विधायक भीड़ जाए तो इन 8 जाति को केन्द्र की ओबीसी सूची में शामिल होने से कौन रोक सकता है? इन 8 जातियों के लिए ये सारे विधायक किस काम के. एक कहावत है कि अंधरा के सुतले की, जाहले की? वैश्य विधान पार्षद को भी आवेदन देकर वस्तु स्थिति से अवगत करायी गयी लेकिन परिणाम कुछ हाथ न लगा.


वैश्य विधायकों में एक जुटता नहीं है. वैश्य समाज के मंच पर एक साथ मिलते हैं लम्हा-लम्हा एक से बढ़कर भाषण देते हैं. श्रोताओं के दिल को बाग-बाग कर देते हैं. तालियों की बौछार हो जाती है. आसमान में काली घटाएं देखकर मोर नाच उठता है. समारोह में वैश्य झूम जाते हैं. परिणाम कुछ ना आने पर यह नाचते मोर के उस स्थिति में पहुँच जाता जब उसकी नजर अपने पाँव पर जाती है.


मंच से उतरते विधायक गण भूल जाते हैं कि ये वैश्य जाति के हैं जिसमें 54 जाति शामिल हैं. ये 54 जाति के प्रतिनिधित्व करते हैं, यह भूल जाते हैं. केवल और केवल अपनी जाति याद रहती है.अवसर के अनुसार ये कभी जाति का, कभी बीसी का, कभी ओबीसी के और कभी पार्टी के नेता बन जाते हैं. वैश्य विधायक वैश्य समाज को सरकारी योजना की जानकारी नहीं देते हैं. जो उसका कल्याण हो सके.


नरेन्द्र मोदीजी और अमित शाहजी से निवेदन है कि यदि वैश्य से किसी को मुख्यमंत्री चुनना है तो नये चेहरे को आगे लाए, जो पहली बार विधायक बने हैं. वैश्य समाज के लिए नरेंद्र मोदी व अमित शाह ही जिंदाबाद हैं. यदि तुम दिन को रात कहो तो हम भी दिन को रात कहेंगे...


- दीपक पोद्दार, सम्पादक वैश्य क्रांति

dais और वह टेक्स्ट जिसमें 'CM' लिखा है की फ़ोटो हो सकती है

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