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सम्पादकीय : वैश्य मतदाताओं की अग्नि परीक्षा

बिहार में वैश्यों की कुल आबादी 2 करोड़ 32 लाख 96 हजार है, जो बिहार की आबादी का 17.82% है। इस आबादी में निरक्षरों की औसत संख्या 72 लाख 87 हजार 214 ; 31.28% और पांचवी तक पढ़ने वालों की संख्या 52 लाख 81 हजार 366 ;34.13% है। कुल संख्या 1 करोड़ 25 लाख 68 हजार 580 है, जो 65.41% होता है। अर्थात् शिक्षा में आधी से अधिक आबादी निरक्षरों और 5वीं तक पढ़ने वालों की है। अब आर्थिक हाल भी जान लें- 6000 रूपये तक मासिक कमाने वाले परिवार की औसत संख्या 49 लाख 30 हजार 864 है अर्थात् ;34.13% परिवार और 6000 रूपये से 10,000 रूपये कमाने वालों की संख्या 14 लाख 90 हजार 520 है अर्थात् ; 29.17%। अर्थात् 10 हजार तक कमाने वालों की कुल संख्या 31 लाख 42 हजार 612 परिवार है, कुल 63.29% परिवार। कुल आबादी 1 करोड़ 48 लाख 33 हजार 108 है।




बिहार के 243 विधानसभा सीट में आबादी के समानुपात में 42-43 सीट पर वैश्य समाज की दावेदारी बनती है। वैश्य समाज की घटक जातियां ज्यादा-से-ज्यादा सीट हथियाने के चक्कर में जातिय सर्वे की मौखिक रूप से गलत बता दिया, गलत साबित करने के लिए इसके पास कोई प्रमाण या साक्ष्य नहीं है। सरकार के समक्ष अब तक किसी ने पूरजोर तरीके से विरोध नहीं किया है |

जातिय सर्वे के मुताबिक वैश्य समाज की 12 घटक जाति को आबादी के समानुपात में 1 से 7 पर दावा बनती है। इससे 41 सीट पर दावा पक्का है।

जातिय सर्वे के पूर्व राजद और जदयू ने कहा था, जिसकी जितनी हिस्सेदारी उसकी उतनी भागीदारी। फिर भाजपा ने भी कहा। लोकसभा चुनाव में यह चुनावी जुुमला से आगे नहीं बढ़ा,  विधानसभा में भी यह चुनावी जुमला कायम रहेगा, इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। विभिन्न राजनैतिक दलों ने वैश्य जातियों का सम्मेलन कराकर इनके नेताओं के महत्वाकांक्षा को आसमान पर पहुंचा दिया है, प्रतिष्ठा का विषय बना दिया है। टिकट तो मिलना नहीं है, लेकिन धन के बल पर इनका अहंकार सांतवें आसमान पर है। जहां अहंकार होता है, वहां बुद्धि घास चरने चली जाती है। ये बटेंगे और कटेंगे।

बनिया की संख्या 30 लाख 26 हजार 912 है।  विधानसभा में एक सीट की दावेदारी के लिए 5 लाख 37 हजार 964 अर्थात् 0.41125% आबादी होनी चाहिए। अपवाद स्वरूप इसमें एक या दो जाति आबादी समानुपात में 1 या 2 सीट का दावेदार बनेगी।

राजनीतिक दलों और वैश्य समाज के महत्वाकांक्षी नेताओं के संघर्ष ने बिहार  विधानसभा के इस चुनाव में वैश्य समाज के आम लोगों को अग्नि परीक्षा में डाल दिया है। वैश्य समाज ऐसी राजनैतिक चुनौती का सामना कभी नहीं किया था। अहंकार में डूबे धन्ना सेठों का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, लेकिन वैश्य स्वाभिमान का क्या हो सकता है, यह विचारणीय है। इस अग्नि परीक्षा में तप के निकल जाएंगे तो सोना हो जाएंगे, वर्ना खाक।

सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा का दायित्व वैश्य मतदाताओं के कंधे पर हैं। वैश्य बनें रहेंगे कि उपजाति में बटेंगे, इसका निर्णय आपके हाथ में है, जो चुनाव परिणाम से 14 नवंबर’25 को सामने आएगा।

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